सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सएप और मेटा को डेटा शेयरिंग को लेकर कड़ी चेतावनी दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि देश के नागरिकों की निजता से किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी व्हाट्सएप की ‘टेक इट ऑर लीव इट’ प्राइवेसी पॉलिसी पर लगी पेनल्टी के खिलाफ दायर अपील की सुनवाई के दौरान आई।
जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने कहा कि ऐसी पॉलिसी से यूजर्स की निजी जानकारी खतरे में पड़ती है। कोर्ट ने टेक कंपनियों के तरीकों पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्राइवेसी से जुड़े नियम इतने जटिल शब्दों में लिखे जाते हैं कि आम लोग उन्हें ठीक से समझ नहीं पाते।
कोर्ट ने पूछा कि यूजर्स को डेटा शेयरिंग से बाहर निकलने यानी ‘ऑप्ट-आउट’ का विकल्प क्यों नहीं दिया जाता। बेंच ने कहा कि भारत में निजता का अधिकार बेहद महत्वपूर्ण है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह की शर्तें निजी डेटा के दुरुपयोग का सभ्य तरीका बनती जा रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब यूजर्स के पास कोई वास्तविक विकल्प न हो—या तो पॉलिसी मानें या ऐप छोड़ दें—तो ऐसे असमान समझौते स्वीकार्य नहीं हैं। कोर्ट ने चिंता जताई कि बड़ी टेक कंपनियां यूजर्स की मजबूरी का फायदा उठा रही हैं और इसे रोका जाना जरूरी है।
















