सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को चुनौती दी गई थी और दोबारा चुनाव कराने की मांग की गई थी।
कोर्ट ने जब मामले की सुनवाई को लेकर अनिच्छा जताई, तो याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट जाने की छूट के साथ याचिका वापस लेने का फैसला किया। इसके बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने याचिका को वापस ली हुई मानते हुए खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील चंदर उदय सिंह ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही अन्य मामलों में ‘फ्रीबीज’ यानी मुफ्त योजनाओं के मुद्दे पर विचार कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब पूरे राज्य में आचार संहिता लागू हो और राज्य आर्थिक संकट में हो, तब बिना बजट समर्थन के चुनाव के दौरान करोड़ों रुपये बांटना चुनावी बराबरी को प्रभावित करता है।
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि यह याचिका एक तरह की संयुक्त चुनाव याचिका थी, जिसमें पूरे चुनाव को रद्द करने की मांग की गई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि भ्रष्ट चुनावी तरीकों का आरोप है, तो हर उम्मीदवार के खिलाफ अलग-अलग और ठोस आरोप होने चाहिए। सही तरीका यह है कि संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों में अलग-अलग चुनाव याचिकाएं दायर की जाएं।
सुनवाई के दौरान सीजेआई ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर जनता किसी पार्टी को वोट नहीं देती, तो केवल प्रचार पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कैश ट्रांसफर स्कीम को चुनौती देनी थी, तो उसे साफ तौर पर याचिका में शामिल किया जाना चाहिए था। चूंकि याचिका में ऐसा कोई स्पष्ट आग्रह नहीं था और केवल पूरे चुनाव को रद्द करने की मांग की गई थी, इसलिए इस पर सुनवाई संभव नहीं है।
अंत में चीफ जस्टिस ने याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट जाने की सलाह दी और कहा कि यह राज्य से जुड़ा मामला है, जिस पर हाई कोर्ट विचार कर सकता है।
















