छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सल उन्मूलन की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती नजर आ रही है। एक ओर विकास और आत्मसमर्पण की नीति पर जोर है, तो दूसरी ओर सुरक्षा बलों का दबाव लगातार बढ़ाया जा रहा है। इसी रणनीति के तहत अब बड़ा जमीनी अभियान शुरू किया गया है।
कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर बड़ा ऑपरेशन
तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित कर्रेगुट्टा पहाड़ी को चारों तरफ से घेरकर ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट-2’ शुरू किया गया है। इस अभियान में सुकमा जिला, बीजापुर जिला और दंतेवाड़ा जिला से करीब 2000 जवान तैनात किए गए हैं। सुरक्षा बल लगातार सर्च और कॉम्बिंग ऑपरेशन चला रहे हैं।
खुफिया एजेंसियों के अनुसार, कर्रेगुट्टा लंबे समय से माओवादियों का सुरक्षित ठिकाना रहा है। हालिया इनपुट में यहां शीर्ष माओवादी नेताओं के साथ 100 से ज्यादा हथियारबंद कैडर की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। इसी कारण इस बार रणनीति केवल तलाशी तक सीमित नहीं है, बल्कि इलाके की पूरी घेराबंदी कर भागने के रास्ते बंद करने पर फोकस किया गया है।
‘मिशन 2026’ के तहत कार्रवाई
अधिकारियों के मुताबिक, 31 मार्च 2026 तक माओवादी हिंसा को खत्म करने के लक्ष्य के साथ यह अभियान ‘डेडलाइन मोड’ में चलाया जा रहा है। कर्रेगुट्टा के आसपास पहले से बने अस्थायी कैंप इस ऑपरेशन को लॉजिस्टिक सपोर्ट दे रहे हैं, जिससे जवानों को रसद, इलाज और त्वरित मदद आसानी से मिल रही है।
यह अभियान व्यापक ‘मिशन 2026’ रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य बस्तर से नक्सल नेटवर्क को पूरी तरह खत्म करना है।
बढ़ता दबाव, घटती ताकत
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि नक्सलियों पर दबाव लगातार बढ़ा है। साल 2024 में 217, 2025 में 256 और 2026 में अब तक 22 नक्सली मारे जा चुके हैं। वहीं गिरफ्तारियां और आत्मसमर्पण के मामले भी बढ़े हैं।
खास तौर पर ‘पुना मार्गम’ अभियान ने नक्सल संगठन को अंदर से कमजोर किया है। साल 2025 में रिकॉर्ड 1573 नक्सलियों ने सरेंडर किया था, जबकि 17 अक्टूबर 2025 को जगदलपुर में 210 नक्सलियों का सामूहिक आत्मसमर्पण हुआ था।
विकास और सुरक्षा साथ-साथ
सरकार की रणनीति केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि विकास को भी इसमें शामिल किया गया है। साल 2025 में 58 और 2026 में 8 नए सुरक्षा कैंप बनाए गए हैं, जिन्हें ‘इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट सेंटर’ के रूप में विकसित किया जा रहा है। इन केंद्रों के जरिए शिक्षा, स्वास्थ्य, राशन, बैंकिंग और बिजली जैसी सुविधाएं नक्सल प्रभावित इलाकों तक पहुंचाई जा रही हैं।
सामाजिक स्तर पर भी लोगों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है। ‘बस्तर ओलंपिक’ में 2024 में 1.65 लाख और 2025 में 3.91 लाख युवाओं की भागीदारी हुई, वहीं ‘बस्तर पंडुम’ जैसे आयोजन सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत कर रहे हैं।
निर्णायक मोड़ पर अभियान
कर्रेगुट्टा ऑपरेशन को इस पूरी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि तेलंगाना और झारखंड में बढ़ते दबाव के बाद नक्सली अब सीमावर्ती दुर्गम इलाकों में सिमट गए हैं। ऐसे में इन ठिकानों को खत्म करना उनके नेटवर्क को बड़ा झटका दे सकता है।
गौरतलब है कि साल 2025 में इसी इलाके में हुए ऑपरेशन में 31 माओवादी मारे गए थे और भारी मात्रा में हथियार बरामद किए गए थे। इसके बावजूद यहां उनकी मौजूदगी बताती है कि अंतिम सफाया अभी बाकी है।
फिलहाल, बस्तर में एक तरफ सुरक्षा बलों की घेराबंदी है, तो दूसरी ओर विकास और पुनर्वास का मॉडल। 31 मार्च 2026 की तय समयसीमा के बीच अब यह अभियान नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई साबित हो सकता हैं।
















