यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन (UGC) के नए नोटिफिकेशन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। UGC की नई गाइडलाइंस को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत में याचिका दायर की गई है, जिसमें जाति आधारित भेदभाव का आरोप लगाया गया है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि UGC के नए नियमों में कुछ जातियों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा गया है, जो समावेशी विकास की भावना के खिलाफ है।
UGC ने हाल ही में एक नया नोटिफिकेशन जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के मुताबिक, नोटिफिकेशन के नियम 3(सी) के तहत UGC अनारक्षित वर्ग के अभ्यार्थियों और शिक्षकों को पर्याप्त संरक्षण देने में विफल रहा है।
UGC पर लगाए गए गंभीर आरोप
विनीत जिंदल नाम के व्यक्ति ने UGC के इन नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। उनका आरोप है कि UGC जाति के आधार पर भेदभाव कर रही है।
याचिका में कहा गया है कि UGC ने जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल SC, ST और OBC वर्ग तक सीमित कर दिया है, जबकि जनरल कैटेगरी के अभ्यार्थियों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि सामान्य वर्ग के छात्रों को भी जाति के आधार पर कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
याचिका में की गई मांग
विनीत जिंदल ने अपनी याचिका में केंद्र सरकार और UGC को अंतरिम आदेश देने की मांग की है कि सभी अभ्यार्थियों के लिए समान अवसर के केंद्र, समान हेल्पलाइन नंबर और लोकपाल तंत्र का गठन किया जाए। साथ ही जातिगत भेदभाव की परिभाषा पर पुनर्विचार करने जरूरत है।
क्या है UGC के नए नियम?
यूजीसी की ओर से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम 2026′ (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) लाया गया है। इसके तहत 4 मुख्य आदेश दिए गए हैं।
- हर यूनिवर्सिटी/ कॉलेज में Equity Committees और Equity Squads का गठन होगा।
- सभी संस्थानों में 24×7 हेल्पलाइन और शिकायत प्रणाली स्थापित की जाएगी।
- SC और ST वर्ग के अभ्यार्थियों को संस्थान में सुरक्षित माहौल प्रदान किया जाएगा।
- नियमों का उल्लंघन करने वालों की मान्यता रद होगी या फिर उनके फंड पर रोक लगा दी जाएगी।
















