मानव शरीर को सही ढंग से काम करने के लिए वात, पित्त और कफ—इन तीनों दोषों का संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है। सर्दियों के मौसम में शरीर में स्वाभाविक रूप से वात दोष बढ़ने लगता है, जिससे जोड़ों में दर्द, पेट की समस्याएं और हड्डियों से जुड़ी दिक्कतें होने लगती हैं। ऐसे में आयुर्वेद में एक प्रभावी औषधि का उल्लेख मिलता है, जो वात दोष को संतुलित करने में मददगार मानी जाती है। यह औषधि है त्रिफला। आयुर्वेद के अनुसार त्रिफला न सिर्फ पाचन संबंधी समस्याओं में लाभकारी है, बल्कि यह बढ़े हुए वात दोष को भी संतुलित करने में सहायक होती है। हालांकि, इसका सही लाभ तभी मिलता है जब इसका सेवन सही तरीके से किया जाए।
कैसे करें त्रिफला का सेवन?
आयुर्वेद में माना गया है कि वात की वृद्धि को रोकना है तो त्रिफला सेवन वसा के साथ करना लाभकारी होगा. वसा के साथ मिलकर त्रिफला ज्यादा तेजी से काम करता है, जैसे घी के साथ त्रिफला का सेवन. रात के समय एक गिलास गुनगुने पानी में आधा से एक चम्मच त्रिफला और शुद्ध देसी गाय का घी मिलाकर लेना चाहिए. इससे आंतों में चिकनाहट पैदा होती है और विषाक्त पदार्थों को निकालने में आसानी होती है
दूसरा तरीका है ‘त्रिफला घृत’. आयुर्वेद में ‘त्रिफला घृत’ को औषधि माना गया है, जिसमें घी को कई औषधियों के साथ मिलाकर पकाया जाता है. अगर बढ़ते वात दोष से परेशान हैं तो रात के समय ‘त्रिफला घृत’ का सेवन कर सकते हैं. ये वात को संतुलित करने के साथ पेट से जुड़े रोगों से भी निजात दिलाएगा.
तीसरा तरीका है अरंडी के तेल के साथ त्रिफला का सेवन. वात की वृद्धि के साथ पेट में कब्ज की समस्या परेशान करने लगती है. इसके लिए अरंडी के तेल की कुछ बूंदें त्रिफला चूर्ण के साथ मिलाकर पानी के साथ ली जा सकती हैं. इससे आंतों की गतिशीलता बढ़ती है. ध्यान रखने वाली बात ये है कि सर्दियों में शाम और रात के वक्त वात प्राकृतिक रूप से बढ़ने लगता है और ऐसे में रात का खाना खाने के बाद 2 घंटे के गैप के साथ त्रिफला का सेवन करें.
















