मिडिल-ईस्ट में बढ़ते तनाव और बढ़ती मुद्रास्फीति की आशंकाओं के बीच, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपनी अप्रैल की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रख सकता है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव और रुपये में तेज गिरावट ने नीतिगत फैसलों को जटिल बना दिया है।
भारत भी संकट से अछूता नहीं
इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक घटनाओं की अनिश्चितता को देखते हुए, RBI अप्रैल में मौजूदा दर को बनाए रख सकता है और अगला कदम उठाने से पहले मुद्रास्फीति के आंकड़ों का इंतजार कर सकता है। वहीं, एसबीआई के मुख्य अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष ने कहा कि भारत इस संकट से अछूता नहीं है। रुपया 93 प्रति डॉलर से ऊपर है और कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया है, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ी है।
सोमवार से शुरू होगी MPC की बैठक
क्रिसिल की मुख्य अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे के मुताबिक, अगर मुद्रास्फीति MPC के लक्ष्य के करीब रहती है, तो ब्याज दरों में बदलाव नहीं किया जा सकता। केंद्रीय बैंक ने पिछले साल फरवरी से अब तक रेपो दर में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की है, जबकि अगस्त, अक्टूबर और फरवरी 2026 में कोई बदलाव नहीं किया गया। 6 सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) की अप्रैल समीक्षा बैठक सोमवार से शुरू होगी और बुधवार को इसके नतीजे घोषित किए जाएंगे। यह वित्त वर्ष 2026-27 की पहली MPC बैठक होगी।















