FCNR प्रवासी भारतीयों (NRI) के लिए डॉलर में कमाई कर भारत में मोटा ब्याज कमाने का सुनहरा दौर फिलहाल के लिए थम गया है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), एचडीएफसी (HDFC) बैंक, आईसीआईसीआई (ICICI) बैंक समेत देश के प्रमुख बैंकों ने फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट यानी एफसीएनआर (FCNR) जमा पर ब्याज दरों में भारी कटौती की है. ये कटौती 310 बेसिस पॉइंट तक की गई है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की तरफ से शुरू की गई विशेष स्वैप विंडो के बंद होते ही बैंकों ने ये बड़ा कदम उठाया है. बीते 10 हफ्तों से विदेशी फंड जुटाने की जो होड़ मची थी, वो अब शांत हो गई है.
ब्याज दरों में भारी गिरावट का गणित
बैंकों ने लंबी अवधि (तीन से पांच साल) वाले विदेशी मुद्रा जमा पर जो अतिरिक्त ब्याज देना शुरू किया था, उसे वापस ले लिया है. 1 सितंबर से नई दरें लागू हो गई हैं. एचडीएफसी बैंक ने अपने पांच साल के अमेरिकी डॉलर FCNR(B) रेट को 6.25% से घटाकर सीधे 3.15% कर दिया है. ये 310 बेसिस पॉइंट की बड़ी गिरावट है. एक बेसिस पॉइंट एक प्रतिशत के सौवें हिस्से के बराबर होता है. आईसीआईसीआई बैंक ने भी ठीक इसी तर्ज पर अपने पांच साल के डॉलर डिपॉजिट रेट को 6.00% से कम करके 2.90% कर दिया है, जो कि 310 बेसिस पॉइंट की ही कटौती है.
एसबीआई ग्राहकों का बदला समीकरण
देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई का हाल भी कुछ ऐसा ही है. बैंक का रेगुलर 5-वर्षीय FCNR(B) रेट अब 3.05% हो गया है. पहले 10 लाख डॉलर तक की जमा पर ‘एडवांटेज स्कीम’ के तहत 5.75% का रिटर्न मिल रहा था. अब इसमें 270 बेसिस पॉइंट की कटौती हुई है. वहीं, 10 लाख डॉलर से ज्यादा के डिपॉजिट पर एसबीआई 6% ब्याज दे रहा था. अब इसमें भी 295 बेसिस पॉइंट की कमी आ गई है.
रिजर्व बैंक का फैसला बनी मुख्य वजह
ये सारा बदलाव आरबीआई के एक कदम के कारण हुआ है. केंद्रीय बैंक ने 8 जून को डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा शुरू की थी. इससे बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने की लागत कम पड़ रही थी. इसी का फायदा उठाकर बैंकों ने एनआरआई ग्राहकों को ऊंचे रिटर्न का लालच दिया. इस स्कीम को इतना जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला कि 21 अगस्त तक ही भारतीय बैंकों ने 65.4 अरब डॉलर का विदेशी फंड इकट्ठा कर लिया. अगर ओवरसीज उधारी समेत समग्र विदेशी मुद्रा प्रवाह को देखें तो ये आंकड़ा 73 अरब डॉलर तक पहुंच गया. लक्ष्य से ज्यादा पैसा आने के कारण आरबीआई ने 30 सितंबर की अपनी डेडलाइन को घटाकर 31 अगस्त कर दिया. विंडो बंद होते ही बैंकों ने प्रीमियम देना भी बंद कर दिया.
छोटी अवधि के रेट लगभग स्थिर
FCNRकेयरएज रेटिंग्स के सीनियर डायरेक्टर संजय अग्रवाल का कहना है कि इस स्कीम से बैंकों को विदेशी मुद्रा फंडिंग का एक नया विकल्प मिला था. इससे बैंकों की लिक्विडिटी में काफी सुधार हुआ. हालांकि, अब ये सुविधा बंद हो गई है, तो लंबी अवधि के डॉलर जमा पर मिलने वाला अतिरक्त लाभ धीरे-धीरे कम हो जाएगा. दिलचस्प बात ये है कि बैंकों ने लंबी अवधि की दरों में तो भारी कटौती की है, लेकिन छोटी अवधि के रेट लगभग स्थिर बने हुए हैं. इससे साफ होता है कि बिना आरबीआई के सपोर्ट के बैंक लंबे समय के लिए डॉलर डिपॉजिट पर भारी प्रीमियम देने के मूड में नहीं हैं.















