योग भारतीय परंपरा का एक अनमोल तोहफा है, जो शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन बनाता है। योग में कई तरह के प्राणायाम शामिल हैं, जिनमें भ्रामरी प्राणायाम को खासतौर पर मानसिक शांति और तनाव कम करने के लिए जाना जाता है।
भ्रामरी शब्द ‘भ्रमर’ यानी भौंरे से लिया गया है। इस प्राणायाम में सांस छोड़ते समय भौंरे जैसी गूंजने वाली आवाज निकलती है। यह आवाज मन और नर्वस सिस्टम को तुरंत शांत करती है और अंदरूनी सुकून का एहसास कराती है। आइए विस्तार से जानते हैं भ्रामरी प्राणायाम के फायदे और इसे करने का सही तरीका।
स्ट्रेस और एंग्जायटी दूर करता है
भ्रामरी प्राणायाम मेंटल स्ट्रेस और एंग्जायटी को तुरंत कम करने में मदद करता है। गूंजने वाली ध्वनि मस्तिष्क की नर्व सेल्स पर शांत प्रभाव डालती है।
अनिद्रा में लाभकारी
नियमित अभ्यास से नींद की क्वालिटी बेहतर होती है और अनिद्रा की समस्या दूर होती है।
ब्लड प्रेशर नियंत्रित करता है
यह प्राणायाम हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने और दिल की धड़कनों को नॉर्मल बनाए रखने में मदद करता है।
मेमोरी तेज करता है
स्टूडेंट्स और कामकाजी लोगों के लिए यह बेहद उपयोगी है, क्योंकि यह दिमाग को स्थिर करता है और एकाग्रता बढ़ाता है।
डिप्रेशन में मददगार
ये प्रणायाम गहरी शांति और पॉजिटिव एनर्जी प्रदान करके दिमाग से डिप्रेशन और नकारात्मक विचारों को कम करता है।
सिरदर्द और माइग्रेन में राहत
इसका अभ्यास नर्वस सिस्टम को संतुलित करता है, जिससे माइग्रेन और सिरदर्द में फायदा मिलता है।
पॉजिटिविटी का अनुभव
भ्रामरी प्राणायाम से भीतर गहरी शांति और पॉजिटिविटी का अनुभव होता है, जिससे आध्यात्मिक विकास भी होता है।
भ्रामरी योग करने का सही तरीका
- सही जगह चुनें- किसी शांत और स्वच्छ जगह पर बैठें, जहां कोई व्यवधान न हो।
- आसन की स्थिति- पद्मासन, सुखासन या वज्रासन में सीधे बैठें और आँखें बंद करें। रीढ़ सीधी होनी चाहिए।
- हाथों की मुद्रा- अंगूठों को दोनों कानों पर लगाएं और कान बंद कर लें। अब तर्जनी अंगुली और मध्यमा अंगुली को हल्के से आंखों पर रखें और आंखें बंद करें। इसके साथ ही अपनी अनामिका अंगुली को नाक के किनारों पर और छोटी उंगली को होंठों पर हल्के से रखें, और मन को शांत और स्थिर करें।
- सांस लेने की प्रक्रिया- नाक से गहरी सांस लें और धीरे-धीरे छोड़ते हुए “हम्म्म…” की गूंजने वाली ध्वनि निकालें, जैसे भौंरा गुनगुना रहा हो।
- समय- शुरुआती लोग 3–5 बार इसका अभ्यास करें। धीरे-धीरे इसे 10–15 बार तक बढ़ाया जा सकता है।
- ध्यान केंद्रित करें- अभ्यास के दौरान केवल उस गूंजने वाली ध्वनि और अपने भीतर की शांति पर ध्यान दें।
(Disclaimer: लेख में उल्लेखित सलाह और सुझाव सिर्फ सामान्य सूचना के उद्देश्य के लिए हैं और इन्हें पेशेवर चिकित्सा सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। कोई भी सवाल या परेशानी हो, तो हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लें।)
















