अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत शुल्क के कारण भारत के आर्थिक विकास और रोजगार से जुड़े निर्यात पर मंडरा रहे संकट के बादल अब छंटते नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच सोमवार देर रात फोन पर हुई बातचीत के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर सहमति बन गई है।
अब भारत और अमेरिका व्यापार समझौते पर जल्द ही एक साझा बयान जारी करेंगे, जिसके बाद इस समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर किए जाएंगे। उम्मीद है कि अगले 10 दिनों के भीतर दोनों देश साझा बयान जारी कर सकते हैं।
समझौते के लागू होते ही रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क को समाप्त कर दिया जाएगा। अमेरिका और 27 देशों वाले यूरोपीय यूनियन (ईयू) जैसे बड़े बाजारों के साथ व्यापार समझौते से भारतीय निर्यात को नई रफ्तार मिलने की संभावना है।
25% से घटकर 18% हुआ पारस्परिक शुल्क
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने मंगलवार को बताया कि इस व्यापार समझौते में देश के नागरिकों के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है। कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को समझौते से बाहर रखा गया है।
उन्होंने कहा कि विपक्ष, खासकर राहुल गांधी द्वारा लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं और इससे लोगों को भ्रमित किया जा रहा है।
समझौते के तहत 25 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद यह व्यवस्था लागू होगी। 18 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क और पहले से लागू शुल्क के बावजूद भारतीय उत्पाद अमेरिका के बाजार में चीन, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, वियतनाम, कंबोडिया और पाकिस्तान जैसे देशों के मुकाबले सस्ते रहेंगे, क्योंकि इन देशों पर अमेरिका ने 18 प्रतिशत से अधिक का शुल्क लगाया हुआ है।
बाकी देशों पर कितना टैक्स?
उदाहरण के लिए लेदर आइटम पर 18 प्लस पहले से लगने वाले आठ यानी कि 26 प्रतिशत का शुल्क लगेगा। जबकि वियतनाम पर 19 प्लस आठ और चीन पर 34 प्लस आठ यानी कि 42 प्रतिशत शुल्क लगेगा। समझौते के तहत भारत अगले पांच साल में अमेरिका से 500 अरब डालर का आयात करेगा।
अभी भारत अमेरिका से सालाना 40 अरब डालर का आयात करता है। इस हिसाब से भारत को सालाना और 60 अरब डालर की खरीदारी अमेरिका से करनी होगी। भारत सालाना रूस से 60 अरब डालर के तेल की खरीदारी कर रहा है और यह खरीद अब अमेरिका से हो सकती है।
इसके अलावा गैस, एयरक्राफ्ट व हाई टेक उत्पाद की खरीदारी भी अमेरिका से की जाएगी। इसलिए भारत को कोई दिक्कत नहीं आएगी। अमेरिका के बाजार में यूके पर 10 प्रतिशत तो ईयू पर 15 प्रतिशत का शुल्क है जो भारत से कम है। लेकिन यूके और ईयू के देश उन वस्तुओं का अमेरिका में निर्यात नहीं करते हैं जिनका निर्यात भारत करता है।
मुख्य बिन्दु
- भारत व अमेरिका में व्यापार समझौते पर सहमति
- निर्यात व आर्थिक विकास पर छाए बादल छंटे,
- अगले सात-दस दिनों साझा बयान जारी करेंगे दोनों देश, फिर समझौते पर हस्ताक्षर
- गोयल ने कहा, समझौते में कृषि व डेयरी शामिल नहीं
- रोजगारपरक सेक्टर के निर्यात को मिलेगी बड़ी छलांग
क्यों हैं अमेरिका का बाजार भारत के लिए महत्वपूर्ण
भारत सबसे अधिक अमेरिका में सालाना 90 अरब डालर का निर्यात करता है और इनमें 30 अरब डालर की हिस्सेदारी ऐसे रोजगारपरक सेक्टर की है जिनपर 50 प्रतिशत शुल्क की वजह से इस 30 अरब डालर के निर्यात प्रभावित होने की आशंका थी जिससे देश का रोजगार भी प्रभावित होता।
इससे देश का आर्थिक विकास भी प्रभावित होता। इनमें मुख्य रूप से टेक्सटाइल, लेदर, जेम्स व ज्वैलरी, केमिकल्स, इंजीनियरिंग गुड्स, कृषि व प्रोसेस्ड आइटम है। अब इन सेक्टर के निर्यात में दोगुनी बढ़ोतरी हो सकती है, क्योंकि अमेरिका के बाजार में भारत को प्रतिस्पर्धा देने वाले देशों पर अधिक शुल्क है।
स्टील व एल्युमीनियम जैसे उत्पाद पर जारी रहेंगे 50 प्रतिशत शुल्क
स्टील व एल्युमीनियम व कुछ ऑटो पार्ट्स पर अमेरिका ने 50 प्रतिशत का शुल्क लगा रखा है और इसमें कोई रियायत नहीं दी गई है, लेकिन अच्छी बात यह है कि यह 50 प्रतिशत शुल्क अमेरिका ने दुनिया के सभी देशों के लिए लगा रखा है, इसलिए इन आइटम के निर्यात भी पहले की गति में होते रहेंगे।
















