वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय रुपये ने डॉलर के मुकाबले 9.88 फीसदी की गिरावट दर्ज की, जो पिछले 14 सालों में सबसे बड़ी कमजोरी मानी जा रही है। इससे पहले वित्त वर्ष 2011-12 में रुपये में 12.4 फीसदी की गिरावट आई थी, जब देश का चालू खाता घाटा बढ़कर 4.2 फीसदी तक पहुंच गया था।
इस बार रुपये में आई गिरावट के पीछे कई अहम कारण रहे। विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार पैसे निकालना, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक बाजार में डॉलर का मजबूत होना इसकी मुख्य वजहें मानी जा रही हैं।
एशियाई मुद्राओं पर भी दिखा असर
सिर्फ रुपया ही नहीं, बल्कि अन्य एशियाई मुद्राओं में भी डॉलर के मुकाबले कमजोरी देखने को मिली। चालू वित्त वर्ष में जापानी येन करीब 6 फीसदी, फिलिपीन पीसो 5.74 फीसदी और दक्षिण कोरियाई वॉन 2.88 फीसदी तक कमजोर हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक बाजार में अस्थिरता और नकदी की कमी ने इन मुद्राओं पर दबाव बढ़ाया है।
वैश्विक हालात और टैरिफ का असर
जानकारों के मुताबिक, इस साल रुपये पर दबाव कई बाहरी कारणों से बढ़ा। शुरुआत में अमेरिका द्वारा भारत पर टैरिफ लगाने से डॉलर की मांग बढ़ी। इसके बाद पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने, खासकर इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच टकराव से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया, जिससे रुपये पर और दबाव बना।
विशेषज्ञों का मानना है कि पूंजी की निकासी, वैश्विक तनाव और आर्थिक चुनौतियों के एक साथ आने से इस वित्त वर्ष में रुपये की स्थिति कमजोर रही।















