जब भी हम हॉलीवुड की बड़ी-बड़ी फिल्में देखते हैं, तो हम भी अपनी सेना और एयरफोर्स के पास उसी तरह की हाई-टेक टेक्नोलॉजी की उम्मीद करने लगते हैं. लेकिन हकीकत ये है कि भारत एक विकासशील (डेवलपिंग) देश है, हमारे पास पश्चिमी देशों की तरह न तो वैसी अत्याधुनिक तकनीक है और न ही एडवांस उपकरण. इसके बावजूद अगर 27 साल पहले 1999 की कारगिल जंग में हमारी सेना ने जीत का परचम लहराया, तो उसके पीछे कोई मशीन नहीं, बल्कि हमारे जवानों का वो बेखौफ जुनून था! एक दीवानापन. इसी से जुड़ी एक कहानी नेटफ्लिक्स की नई सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में देखने को मिलती है.
जब हम आम लोग फ्लाइट में सफर करते वक्त हल्के से एयर टर्बुलेंस (हवा के झटके) में ही सीट बेल्ट कसकर हनुमान चालीसा पढ़ने लगते हैं, उस दौर में 1999 के बर्फीले कारगिल युद्ध के दौरान -40 डिग्री के तापमान में, सुपरसोनिक स्पीड से उड़ते हुए सटीक निशाना लगाना कोई इंसानी काम नहीं लगता. ये काम सिर्फ वही कर सकते हैं जिनके सिर पर देश के प्यार का जुनून सवार हो. निर्देशक ओनी सेन की नेटफ्लिक्स पर आई सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ इन्हीं अनाम नायकों की कहानी है. ये उन गोल्डन एरोज (Golden Arrows) की गाथा है जिन्हें इतिहास के पन्नों में उतना नहीं याद किया गया जितने के वो हकदार थे. तो क्या 6 एपिसोड की ये सीरीज आपके दिल में उनके लिए जगह बना पाएगी? आइए जानते हैं इस रिव्यू में.
कैसी है सीरीज की कहानी?
कहानी शुरू होती है 27 मई 1999 से, यानी कारगिल युद्ध का 24वां दिन, इसी दिन स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा (सिद्धार्थ) का मिग-21 जेट कारगिल की बर्फीली चोटियों के ऊपर एक स्टिंगर मिसाइल का शिकार हो गया था. ये ओपनिंग सीन ऐसा है कि आपकी सांसें गले में ही अटक जाती हैं. इसके तुरंत बाद कहानी चार महीने पीछे फ्लैशबैक में जाती है, जहां विंग कमांडर बी.एस. धनोआ उर्फ टॉनी (जिमी शेरगिल) अपने पुराने साथी आहूजा को भटिंडा लेकर आते हैं. मकसद होता है, मिग-21 उड़ाने वाले नौसिखिए और अल्हड़ युवा पायलटों को जंग के लिए लोहे की तरह तराशना.
कहानी हमें 1999 के उस दौर में ले जाती है जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी लाहौर बस यात्रा के जरिए शांति का पैगाम दे रहे थे, लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तान के जनरल परवेज मुशर्रफ अपनी नापाक चालें चल रहे थे. जब भारतीय सेना के जवान नीचे से चोटियों पर चढ़ने की कोशिश में पाकिस्तानी घुसपैठियों की गोलियों का सामना कर रहे थे, तब वायुसेना को ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ का जिम्मा सौंपा गया. कैंटरबरी से सीमित संसाधनों (लिमिटेड रिसोर्स), तंग रास्तों और मिसाइलों के खतरों के बीच ये युवा फाइटर ने ये जंग जीती, ये जानने के लिए आपको नेटफ्लिक्स पर ये सीरीज देखनी होगी.
कैसी बनी है सीरीज और कैसा है डायरेक्शन?
‘ऑपरेशन सफेद सागर’ की सबसे खूबसूरत बात यह है कि ये ‘लाउड देशभक्ति’ (जिंगोइज्म) और छाती पीटने वाले ड्रामेबाजी से मीलों दूर रहती है. निर्देशक ओनी सेन ने इसमें कोई खोखला भाषण या पाकिस्तान के खिलाफ गाली-गलौज ठूंसने के बजाय फौजियों के अनुशासन और उनके इंसानी पक्ष पर जोर दिया है. हम अक्सर स्टार्स या स्टार किड्स की जिंदगी का एक-एक अपडेट रखते हैं, लेकिन जिन फौजियों ने देश के लिए जान दी, उनके जाने के बाद उनके परिवारों का क्या हुआ, ये जानने की जहमत कभी नहीं उठाते. यह सीरीज आपको एयरफोर्स मेस की वही जिंदगी दिखाती है, जहां नए पायलटों का स्वागत ‘बाउंस’ (खाना-पीना और मस्ती) से होता है, और पीछे बैठी पत्नियां हर उड़ान के साथ अपनी धड़कनें रोके इंतजार करती हैं.
तकनीकी रूप से देखें तो सीमित बजट में ओनी सेन ने बहुत ही उम्दा काम किया है. हालांकि, जहां-जहां कम्प्यूटर ग्राफिक्स (CGI) का इस्तेमाल हुआ है, वहां साफ पता चलता है कि हमारे पास हॉलीवुड जैसा बजट नहीं है. कुछ एरियल डॉगफाइट (हवाई भिड़ंत) सीन्स में एनीमेशन जैसा अहसास होता है. इसके अलावा, विदेशी नेताओं या पॉलिटिशियंस को दिखाने वाले सीन थोड़े बचकाने लगते हैं. लेकिन जब-जब कैमरा हमारे पायलटों के कॉकपिट और उनके चेहरों के तनाव पर टिकता है, तब-तब यह सीरीज सीधे दिल पर वार करती है.
एक्टिंग
सिद्धार्थ ने स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा के किरदार में अपनी आत्मा उंडेल दी है. ‘रंग दे बसंती’ के सालों बाद उन्हें एक बार फिर ऐसे जुनूनी, देशप्रेमी और मजबूत किरदार में देखना आपकी आंखों में आंसू ला देता है. उनका शांत रवैया और जवानों से बेस्ट काम निकलवाने का अंदाज बेहतरीन है. जिमी शेरगिल हमेशा की तरह अपने रोल में एकदम खरे उतरे हैं. युवा पायलटों के रोल में अभय वर्मा, मिहिर आहूजा, तारुक रैना और अर्णव भसीन ने कमाल की एनर्जी भरी है. उनकी चंचलता और जंग के मैदान में उनका खौफ दोनों बहुत नेचुरल लगते हैं. अन्य किरदारों में आदिल हुसैन, मनु ऋषि चड्ढा (मुशर्रफ के रोल में बेहतरीन) और विनय पाठक (नवाज शरीफ) ने अपना काम बहुत ईमानदारी से किया है. अमृता बागची, दीया मिर्जा, प्राजक्ता कोली के पास करने के लिए खास कुछ नहीं था, लेकिन एक फौजी की पत्नी का छिपा हुआ दर्द अमृता बागची ने बहुत ख़ूबसूरती से दिखाया है
जिमी शेरगिल
क्यों देखें और क्यों न देखें?
अगर आप ‘फिल्मी मसाले’, गाड़ियों के उड़ने, भारी-भरकम डायलॉगबाजी या हर सीन में चीख-चीखकर देशभक्ति साबित करने वाले सिनेमा के फैन हैं, तो शायद यह सीरीज आपको थोड़ी धीमी और सीरियस लग सकती है. कुछ जगह इसकी रफ्तार और लंबा खिंचाव आपको बोर भी कर सकता है.
लेकिन अगर आप अपने देश के असली हीरोज की उस अनकही गाथा को देखना चाहते हैं, जिसने कारगिल युद्ध का पासा पलट दिया था, तो यह सीरीज देखना आपका फर्ज बनता है. ये सीरीज हमें सिखाती है कि जब देश की मिट्टी और आसमान को बचाने की बात आती है, तो हमारे जवान संसाधनों की कमी का रोना नहीं रोते, बल्कि अपनी जान की बाजी लगा देते हैं.
कुल मिलाकर, ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ सिर्फ 6 एपिसोड का मनोरंजन नहीं है, बल्कि ये हमारी सेना को दिया गया एक बेहद सच्चा ट्रिब्यूट सलाम है. आज हम एसी कमरों में बैठकर, लैपटॉप पर उंगलियां चलाते हुए बड़ी आसानी से अपने ‘फंडामेंटल राइट्स’ का ढिंढोरा तो पीट लेते हैं, लेकिन अपनी ‘फंडामेंटल ड्यूटीज़’ को पूरी तरह भूल जाते हैं. एसी में बैठकर इंटरनेट पर नुक्स निकालना बहुत आसान है, लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि आज हम सुरक्षित बैठकर इंटरनेट पर बहसबाज़ी कर पा रहे हैं, क्योंकि 27 साल पहले भी देश के कुछ दीवानों ने हमारी सुरक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था, और आज भी वही जज्बा लिए हुए सेना के जवान हमारी हिफाजत के लिए पहरा दे रहे हैं. अजय आहूजा जैसे कितने ही जाबांज फौजी हैं, जिन्होंने दुश्मन का बर्बर टॉर्चर सहा और शायद उन्हें वक्त पर एक रोटी भी नसीब नहीं हुई, फिर भी उन्होंने हमारी सुरक्षा के लिए मुस्कुराकर शहादत चुन ली. यही वजह है कि कमियों के बावजूद, इसकी साफ नीयत और प्रेरक कहानी इसे इस इंडिपेंडेंस डे (या किसी भी दिन) पर देखा जाने वाला एक बेहतरीन शो बनाती है.
















