देश का 2026-27 का आम बजट ऐसे समय आने वाला है, जब दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सबसे अस्थिर और अनिश्चित दौर से गुजर रही है। मौजूदा वैश्विक हालात सिर्फ राजनीतिक या आर्थिक नहीं, बल्कि गंभीर सुरक्षा और सैन्य खतरों से भी जुड़े हुए हैं।
ऐसे हालात में भारत जैसे उभरते वैश्विक शक्ति वाले देश के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा अब सिर्फ सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह गई है।
वैश्विक अस्थिरता में भारत की बढ़ती रक्षा चुनौतियां
पड़ोसी देशों के साथ जटिल रिश्ते और लंबी समुद्री सीमाएं भारत की रक्षा जरूरतों को और बढ़ा रही हैं। युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और अब अत्याधुनिक तकनीक से लैस हथियारों की भूमिका बढ़ती जा रही है, जिससे रक्षा चुनौतियां पहले से कहीं ज्यादा जटिल हो गई हैं।
अब सिर्फ हथियार खरीदना या तकनीक को अपग्रेड करना ही काफी नहीं है, बल्कि सेनाओं को नए दौर की युद्ध प्रणाली के हिसाब से पूरी तरह तैयार करना जरूरी हो गया है।
पारंपरिक युद्ध से हाइब्रिड युद्ध की ओर
हाल के युद्धों जैसे ऑपरेशन सिंदूर, अमेरिका-ईरान तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और गाजा में इजरायल-हमास संघर्ष ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य की जंग में हवाई और तकनीकी ताकत निर्णायक भूमिका निभाएगी।
चीन सीमावर्ती इलाकों में तेजी से सैन्य ढांचा विकसित कर रहा है और साइबर व अंतरिक्ष युद्ध क्षमताओं में निवेश बढ़ा रहा है। वहीं पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद अब ड्रोन, यूएवी और साइबर हमलों के जरिए नए रूप में सामने आ रहा है।
इसके अलावा, हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक मौजूदगी, रणनीतिक बंदरगाहों में निवेश और समुद्री रास्तों पर नियंत्रण की कोशिशें भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन रही हैं।
सेनाओं का आधुनिकीकरण जरूरी
इन परिस्थितियों में यह साफ है कि थल सेना, नौसेना और वायुसेना को आधुनिक हथियारों और तकनीक से लैस करना बेहद जरूरी है।
हालांकि संख्या के लिहाज से भारतीय सेनाएं दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में हैं, लेकिन आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुकाबले कई जगह क्षमताओं की कमी नजर आती है।
थल सेना को बेहतर एयर डिफेंस सिस्टम, आधुनिक टैंक और नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली की जरूरत है। वायुसेना लंबे समय से लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही है, हालांकि अब 114 नए राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की प्रक्रिया आगे बढ़ती दिख रही है।
नौसेना के लिए युद्धपोत और पनडुब्बियों की कई परियोजनाएं चल रही हैं, लेकिन इनमें तेजी लाने की जरूरत है।
भविष्य की जंग: साइबर, स्पेस और AI
आधुनिक युद्ध में साइबर स्पेस, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्वचालित हथियार युद्ध की प्रकृति को पूरी तरह बदल रहे हैं।
ऐसे में जरूरी है कि रक्षा बजट में पूंजीगत निवेश बढ़ाया जाए, ताकि आने वाली चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।
साथ ही, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल के लिए संयुक्त थिएटर कमांड बनाने की योजना को जमीन पर उतारना जरूरी है और इसे बजट व प्रशासनिक अड़चनों से बाहर निकालना होगा।
रक्षा बजट और उसकी सीमाएं
भारत दुनिया के शीर्ष पांच रक्षा खर्च करने वाले देशों में शामिल है, लेकिन फिर भी चीन, अमेरिका और रूस के मुकाबले यह खर्च कम है।
2025-26 के बजट में रक्षा के लिए 6.81 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जो पिछले वर्ष से करीब 9.5 फीसदी ज्यादा था। हालांकि इसमें से पूंजीगत खर्च सिर्फ 1.81 लाख करोड़ रुपये ही था।
सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने हाल ही में कहा है कि रक्षा खरीद में फंड की कमी नहीं आने दी जाएगी और सरकार ने सेनाओं को इस बारे में भरोसा दिया है।
आत्मनिर्भरता और थिएटर कमांड पर जोर
रक्षा विशेषज्ञ रिटायर्ड मेजर जनरल जेकेएस परिहार का कहना है कि स्वदेशी हथियारों की असली परीक्षा उनकी समय पर उपलब्धता और गुणवत्ता है। आत्मनिर्भरता की नीति और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद अंतर को पाटना जरूरी है।
उनका कहना है कि रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा वेतन और पेंशन में चला जाता है, इसलिए पूंजीगत आवंटन में बड़ी बढ़ोतरी जरूरी है। हर साल बजट में बढ़ोतरी जरूर होती है, लेकिन वह अक्सर महंगाई के बराबर ही होती है, जो तेजी से हो रहे सैन्य आधुनिकीकरण के लिए पर्याप्त नहीं है।
मेजर जनरल परिहार के अनुसार, हालिया युद्धों से यह साफ है कि भविष्य में कम अवधि के तीव्र युद्ध से लेकर कई साल चलने वाली जंग तक की आशंका है, जिसके लिए सेनाओं को पूरी तैयारी रखनी होगी।
उनका सुझाव है कि रक्षा बजट को जीडीपी के कम से कम 3 फीसदी तक बढ़ाया जाए और राजस्व व पूंजीगत खर्च को अलग-अलग रखा जाए।
स्पष्ट है कि वित्त मंत्री से सेनाओं को उम्मीद होगी कि बदलते सुरक्षा हालात को देखते हुए रक्षा बजट में ऐसा फैसला लिया जाए, जो देश की सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में निर्णायक साबित हो।
















