देशभर में मुफ्त योजनाओं (फ्रीबीज) को लेकर बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में नाराजगी जताई है। इसी बीच छत्तीसगढ़ के बजट की पड़ताल में कई अहम बातें सामने आई हैं। आंकड़े बताते हैं कि राज्य सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत जरूरतों की तुलना में ज्यादा पैसा सहायता और सब्सिडी पर खर्च कर रही है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट के अनुसार राज्य के मुख्य बजट का करीब 40 फीसदी हिस्सा सहायता एवं सब्सिडी मद में जा रहा है, जो एक बड़ा हिस्सा माना जा रहा है।
राजनीतिक दलों के लिए फायदेमंद, लेकिन चिंता भी
विशेषज्ञों का मानना है कि मुफ्त योजनाएं राजनीतिक रूप से फायदेमंद होती हैं, लेकिन लंबे समय में राज्य की आर्थिक स्थिति और विकास योजनाओं पर इसका असर पड़ सकता है। केंद्र सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में भी इस प्रवृत्ति को लेकर चिंता जताई गई है।
राज्य की कुल आय 2025-26 में लगभग 1.65 लाख करोड़ रुपए आंकी गई है, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 12 फीसदी ज्यादा है। अब सबकी नजर 2026-27 के बजट पर है।
बजट का बड़ा हिस्सा सब्सिडी में खर्च
बजट के आंकड़ों के मुताबिक खर्च का बंटवारा इस तरह है:
- सहायता एवं सब्सिडी: 40%
- प्रतिबद्ध व्यय: 34%
- पूंजीगत व्यय: 16%
- अन्य व्यय: 10%
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जब बजट का बड़ा हिस्सा पहले से चल रही योजनाओं और कर्ज के ब्याज में खर्च हो जाता है, तो नई परियोजनाओं के लिए फंड जुटाना मुश्किल हो जाता है।
फ्री योजनाएं: चुनावी फायदा ज्यादा
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों में किसानों, बिजली उपभोक्ताओं, महिलाओं और गरीब वर्ग को राहत देने के लिए कई योजनाएं लागू की गई हैं। इन योजनाओं से लोगों को तुरंत फायदा मिलता है, जैसे नकद सहायता, सस्ती बिजली और मुफ्त सेवाएं। यही वजह है कि चुनाव के समय ये योजनाएं राजनीतिक तौर पर काफी असरदार साबित होती हैं।
वर्ष 2018 में किसानों को 3100 रुपए प्रति क्विंटल धान खरीदने का वादा बड़ा मुद्दा रहा था। वहीं 2023 के चुनाव में महतारी वंदन योजना ने भी अहम भूमिका निभाई।
महिला एवं बाल विकास बजट में भारी बढ़ोतरी
2023 में सरकार बनने के बाद महिला एवं बाल विकास विभाग का बजट 112 फीसदी बढ़ा। इसकी मुख्य वजह महतारी वंदन योजना रही, जिसके तहत हर महीने करीब 70 लाख महिलाओं के खाते में 1000 रुपए भेजे जा रहे हैं।
सब्सिडी छोड़ने के उदाहरण भी मौजूद
देश में पहले भी लोगों ने स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ी है। नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर लाखों लोगों ने गैस सब्सिडी छोड़ दी थी। इसी तरह राज्य सरकार ने इनकम टैक्स देने वाले लोगों के राशन कार्ड भी निरस्त किए हैं, जिन पर सब्सिडी मिलती थी।
विशेषज्ञों की राय
रिटायर्ड आईएएस बीकेएस रे के मुताबिक, चुनाव जीतने के लिए मुफ्त योजनाएं सबसे आसान तरीका बनती जा रही हैं। उनका कहना है कि इस पर सभी राजनीतिक दलों को मिलकर कोई ठोस नीति बनानी चाहिए।
- फैक्ट फाइल: बजट खर्च (2025-26)
- सहायता एवं सब्सिडी: 40%
- प्रतिबद्ध व्यय: 34%
- पूंजीगत व्यय: 16%
- अन्य व्यय: 10%
टॉप विभागों में खर्च
- शिक्षा विभाग: 12%
- पंचायत एवं ग्रामीण विकास: 10%
- कृषि एवं किसान कल्याण: 8%
- लोक निर्माण विभाग: 5%
- खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति: 5%
सब्सिडी और सहायता का खर्च (करोड़ में)
- किसानों को बोनस: 12,000
- धान खरीदी घाटा: 8,000
- महतारी वंदन योजना: 8,000
- बिजली बिल रियायत: 7,500
- राशन सब्सिडी: 8,000
- उद्योग राहत: 1,500
- तेंदूपत्ता बोनस: 250
- अन्य योजनाएं: 5,000
विशेषज्ञों का मानना है कि मुफ्त योजनाओं और विकास कार्यों के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
















