मध्य प्रदेश के जबलपुर में पंजाब नेशनल बैंक (PNB) से जुड़ा एक बड़ा गोल्ड लोन फ्रॉड सामने आया है। सदर बाजार शाखा में कथित तौर पर नकली सोने के जेवर गिरवी रखकर करीब 43 लाख रुपये का गोल्ड लोन हासिल किया गया। मामला तब खुला जब कई खातों में लोन की रकम लंबे समय तक जमा नहीं हुई और बैंक ने गिरवी रखे जेवरों की दोबारा जांच करवाई। जांच में जेवर नकली पाए गए, जिसके बाद बैंक प्रबंधन ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस ने इस मामले में दो वैल्यूवर समेत 15 लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी और अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया है। शुरुआती जांच में यह मामला केवल फर्जी लोन का नहीं बल्कि सुनियोजित साजिश का प्रतीत हो रहा है, जिसमें बैंक के भरोसे और प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया गया।
PNB गोल्ड लोन घोटाले का मास्टरमाइंड कौन?
जांच एजेंसियों के अनुसार इस पूरे मामले का मुख्य आरोपी बैंक से जुड़े वैल्यूवर और एक ज्वेलरी कारोबारी राजीव सोनी को माना जा रहा है। आरोप है कि उसने 13 ऐसे लोगों के नाम पर गोल्ड लोन की फाइलें तैयार कराईं, जिनके जरिए बैंक से रकम निकलवाई गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि कुछ मामलों में परिवार के लोगों के नाम का भी इस्तेमाल किया गया।
गोल्ड लोन प्रक्रिया में वैल्यूवर की भूमिका बेहद अहम होती है क्योंकि वही यह तय करता है कि गिरवी रखा गया सोना असली है या नहीं और उसकी कीमत कितनी है। ऐसे में यदि मूल्यांकन करने वाला व्यक्ति ही नियमों से समझौता कर ले तो बैंक के लिए जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
मामले की जांच कर रही पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या इस नेटवर्क में और लोग शामिल थे। बैंक रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा और वित्तीय लेन-देन की जानकारी खंगाली जा रही है। जांच पूरी होने के बाद आरोपियों के खिलाफ और गंभीर धाराएं भी जोड़ी जा सकती हैं।
नकली सोना, फर्जी ग्राहक और बैंकिंग सुरक्षा पर सवाल
इस मामले ने एक बार फिर गोल्ड लोन सिस्टम की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आमतौर पर गोल्ड लोन को सुरक्षित बैंकिंग उत्पाद माना जाता है क्योंकि इसके बदले बैंक के पास गिरवी संपत्ति होती है। लेकिन जब मूल्यांकन प्रक्रिया में ही गड़बड़ी हो जाए तो पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों को रोकने के लिए वैल्यूवर की स्वतंत्र जांच, समय-समय पर ऑडिट और डिजिटल रिकॉर्ड की निगरानी जरूरी है। कई बैंक अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित जांच और मल्टी-लेयर वेरिफिकेशन सिस्टम पर भी काम कर रहे हैं ताकि फर्जीवाड़े की संभावना कम हो सके।
फिलहाल जबलपुर पुलिस और बैंक प्रबंधन पूरे मामले की गहराई से जांच कर रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह पता लगाया जा रहा है कि 43 लाख रुपये के इस घोटाले में किस स्तर तक मिलीभगत हुई और बैंक को हुए नुकसान की भरपाई कैसे की जाएगी। मामले के सामने आने के बाद बैंकिंग सेक्टर में गोल्ड लोन से जुड़ी सुरक्षा प्रक्रियाओं पर भी नई बहस शुरू हो गई है।
















